पुस्तक समीक्षा #2 : सिंह मर्डर केस – रमाकांत मिश्र

 

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Reviewed By : – SABA KHAN

कोई भी काम खासतौर पर लेखन कर्म जब अपनी पूरी तैयारी और ईमानदार कोशिशों से परवान चढ़ता है तो उसका मकसद भी पूरी शिद्दत से कामयाब होता है I लिखना एक जटिल प्रक्रिया है और इस लिखने के दौरान एक गंभीर लेखक को न केवल अपने पात्रों की मनःस्थिति से जूझना पड़ता है बल्कि निरंतर खुद के भीतर उमड़ घुमड़ रहे अनगिनत विचारों की क्रमवार श्रृंखलाओं से भी दो चार होना पड़ता है I और इस होती निरंतर उथल पुथल का प्रभाव रचना पर पड़ना स्वाभाविक है I रहस्य, जासूसी तथा अपराध कथा लेखन ने समय के साथ साथ खुद के लेखन में नयी नयी शैलियाँ, नए नए Narrative Style भी विकसित किये हैं I और इस लेखन में भी न केवल भाषा बल्कि अन्य कई रचनात्मक स्तरों पर भी गंभीर प्रयास किये गए हैं I और लगातार हुवे इन प्रयोगों, कथन शैली तथा प्रस्तुतीकरण ने पाठकवर्ग को और भी ज्यादा सजग बना दिया है I जिसके चलते इस तरह के लेखन में कोई भी लेखक बड़े बड़े दावे करने के वाबजूद खुद को इस विधा के लेखक के रूप में इतनी आसानी से नहीं स्थापित कर सकता और अगर उसका लेखन सिर्फ सतही जानकारियों पर ही आधारित हो और औने पौने से ही काम चला लेने की मनःस्थिति से युक्त हो तो ये काम और भी ज्यादा मुश्किल है I एक अच्छी अपराध तथा रहस्य कथा की कामयाबी की बुनियाद इन्ही कुछ तथ्यों के इर्द गिर्द ही रहती है और एक काल्पनिक रचना होने का तमगा लिए हुवे भी वास्तविकता के पहलूवों से उसकी निकटता पाठकवर्ग से खुद को जोड़ने में उतनी ही कामयाब रहती है I

इस विधा का अंग्रेजी भाषा में लेखन का परिदृश्य न केवल आरंभिक समय से बल्कि वर्तमान में भी हर स्तर पर नितांत समृद्ध भी है और समर्थ भी I भारतीय सन्दर्भ में भी कमोबेश यही स्थिति है –जहाँ एक ओर इस विधा के लेखन में अंग्रेजी भाषा में लगभग हर दुसरे या तीसरे महीने में एक नया लेखक उभर रहा है और पाठकों के बीच अपनी जगह बना रहा है, तो दूसरी ओर हिंदी भाषा में एक दो बड़े लेखकों को छोड़कर ( वो भी जो कई दशकों से इस विधा के लेखन में रत हैं ) कोई नया चेहरा उभर कर नहीं आ रहा है I और ये स्थिति तब है जबकि अंग्रेजी भाषा में भारतीय लेखकों की इस विधा में लेखन की भागीदारी पिछले कई वर्षों के मुकाबले हाल ही में तीव्र गति से बढ़ी है I ऐसी स्थिति में जब कोई नया लेखक अपराध और रहस्य कथा के तमगे के साथ अपने पहले उपन्यास को लेकर हिंदी भाषा में ऐसा कोई प्रयास करते हुवे पाठकों के बीच आता है तो उस पर ध्यान आकर्षित होना लाजिमी है I

चंद दिनों पहले सोशल प्लेटफॉर्म्स के जरिये एक नवोदित लेखक रमाकांत मिश्र लिखित “ सिंह मर्डर केस “ नाम के अंग्रेजी टाइटल वाले हिंदी भाषा में आने वाले उपन्यास के विज्ञापन पर नजर पड़ी तो मन में उत्सुकता का भाव पैदा हुआ और पढ़ने की इच्छा भी बलवती हुई I

उपन्यास हस्तगत होते ही मन में बहुत ही अच्छा भाव पैदा हुआ I टाइटल कवर बहुत आकर्षक बन पड़ा है और निश्चित तौर पर इस कवर आर्ट के लिए ‘ हनुमेंद्र मिश्र ‘ बधाई के पात्र हैं ( शायद लेखक से किसी पूर्व परिचय या सम्बन्ध के कारण की गयी अतिरिक्त मेहनत का नतीजा हो ) I प्रकाशक सूरज पॉकेट बुक्स ने इस उपन्यास की प्रूफरीडिंग, पेपर क्वालिटी, पैकेजिंग और मुद्रण में मेरे द्वारा पूर्व में समीक्षित उपन्यास “ एक हसीन क़त्ल “ के मुकाबले पूरी व्यावसायिकता का परिचय देते हुवे आश्चर्यजनक तौर पर सुधार किया है I कुछ स्थानों पर प्रूफ संबंधी त्रुटियाँ अवश्य हैं लेकिन उनके द्वारा इस दिशा में निरंतर किये जा रहे प्रयास निकट भविष्य में किसी भी समीक्षा में स्वयं को इस आधार पर आँका जाना नहीं पसंद करेंगे, ऐसी आशा है I अभी तक किताबों पर बार कोड भी नहीं आ रहा है, इसका कारण भी समझ में नहीं आया I बहरहाल बधाई के पात्र हैं इस पुस्तक के साथ ‘सूरज पॉकेट बुक्स’ I

कुल १७६ पृष्ठों की इस किताब में कहानी का फैलाव १६६ पृष्ठों में है जो १६ अध्यायों में बंटी हुई है I  मूल्य १९९ रुपये जो की इस किताब की गुणवत्ता, इसके स्टैण्डर्ड साइज़ और औसतन ३० पंक्तियाँ प्रति पृष्ठ के मद्देनज़र बिलकुल वाजिब है I

प्रथम पृष्ठ पर आल्हा की पंक्तियाँ “ जाके बैरी सन्मुख जीवे I ताके जीवन को धिक्कार I I “ काफी कुछ इस उपन्यास के कथ्य का आभास दे जाती हैं I पुस्तक की भूमिका श्री जीतेन्द्र माथुर द्वारा देखकर अच्छी अनुभूति होती है वो न केवल एक सफल समीक्षक हैं बल्कि एक विद्वान् एवं सफल लेखक भी हैं और भूमिका में भी उन्होंने अपनी विद्वता और गुणग्राह्यता का परिचय दिया है I

कहानी की शुरुवात होती है एक नृशंशतापूर्ण क़त्ल से ( एक रहस्य कथा का आगाज़ इस से बेहतर क्या हो सकता है ! ) I लखनऊ में डी० एस० पी० प्रशांत सिंह के युवा पुत्र समर्थ सिंह के विवाह का अवसर है, हर्षोल्लास का वातावरण है I समर्थ सिंह अपने दोस्तों को विदा करने बाहर आता है और विदा करके ठिठक कर पोर्टिको में खड़ी मंगनी में प्राप्त पज़ेरो को देखने लगता है तभी अचानक पजेरो स्टार्ट होती है और उस पर चढ़ जाती है I इस से पहले लोग कुछ समझ पाते पजेरो तीन बार समर्थ सिंह को कुचलती है और ठहर जाती है I लोग अन्दर से जब तक बाहर पहुचते हैं तब तक हत्यारा फरार हो चुका होता है I

चूंकि मामला पुलिस मशीनरी के आला उच्चाधिकारी के बेटे के क़त्ल का था लिहाज़ा ऊंचे स्तर पर जांच पड़ताल होती है और नतीजा न निकलने पर केस सी० बी० आई० के होनहार चतुर अधिकारी मदन मिश्र के हवाले कर दिया जाता है I

उपरोक्त स्टोरीलाइन के इर्द गिर्द ही पूरा कथानक रचा गया है जिसे पढ़ते हुवे पाठक खुद को उन पात्रों और घटनाओं के मध्य उलझता और घटनाओं के प्रवाह में बहता चला जाता है I कथानक २०१४ से शुरू होता है और फिर पीछे जाता है I अंत में उस समय तक जाता है जहाँ इस कथानक की जड़ें हैं -१९९८ तक I फिर २०१५ में समाप्त हो जाता है I उपन्यास का संपूर्ण कथानक यू० पी के कई जिलों से लेकर मध्य प्रदेश, मुंबई, उत्तराखंड, दिल्ली, अहमदाबाद, तक फैला हुआ है I इस स्तर पर लेखक ने न केवल अपनी कुशल लेखन कला के बल्कि विषय तथा संपूर्ण भारतीय पुलिस तंत्र, उसका चरित्र, उसकी कार्यशैली, उसकी बारीकियों पर अपनी तीखी पकड़ का परिचय दिया है I इस तंत्र की हर बारीकी को लेखक ने भली भांति अपने अन्वेषण और अध्ययनोंपरांत अपने लेखन के मूलकथ्य का हिस्सा बनाया है जिसके कारण उपन्यास की न केवल रोचकता बढ़ी है बल्कि कथानक वास्तविकता के और भी निकट प्रतीत होता है I उपन्यास अपने अंतर में एक साहित्यिक स्पर्श का सुखद अनुभव सा प्रदान करता हुआ चलता है I कभी हिंदी साहित्य के जानेमाने  लेखक और रागदरबारी जैसी कालजयी रचना के लेखक श्रीलाल शुक्ल नें “ आदमी का ज़हर” नामक एक रहस्य कथा उपन्यास लिखा था I हालांकि उनका ये प्रयोग उस वक़्त बुरी तरह नकारा गया था लेकिन अपने लेखन और शैली में वो पूरी तरह सफल था I कुछ इसी तरह का एहसास ये उपन्यास पढ़ते हुवे होता है जिसका मुख्य कारण इसकी समृद्ध साहित्यिक हिंदी युक्त भाषा भी है I लेखक ने हिंदी के क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग से दूरी रखी है फिर भी आम लेखकों के मुकाबले विशुद्ध हिंदी का प्रयोग किया है जिसमे सटीक शब्द चयन और जरूरत पड़ने पर प्रचलित कहावतों का प्रयोग उसे और समृद्ध बनाती है I

उपन्यास अपनी narrative form के चलते एक Hardboiled Mystery ना होकर मूल रूप से एक Softboiled Thriller ही बनकर रह गया है जिसमे रहस्य का पहलू Secondry है और भावनात्मक पहलू का चित्रण प्रभावी रूप से उभर कर आया है जिसे लेखक नें इस तरह से रचा है की पाठक पढ़ने के बाद कहीं से खुद को ठगा जाना महसूस नहीं करता है I बशर्ते इसे इस जिद के तहत न पढ़ा जाए की एक मर्डर मिस्ट्री ही पढ़कर उठना है I

लेखक ने कथा को कहने के लिए जिस Cut to Back तथा Cut to Forth और फ्लैशबैक तकनीक का प्रयोग किया है उसको साधकर कथा के प्रवाह में बगैर रुकावट आये और पाठक की एकाग्रता को भंग किये बगैर प्रयोग करना किसी भी नवोदित लेखक के लिए मुश्किल कार्य है, मगर रमाकांत मिश्र नें ये काम किसी हद तक सफलतापूर्वक किया है I ये बात दूसरी है की इस तकनीक के प्रयोग ने ही एक अच्छी और लाजवाब बन सकती ‘Police Procedural रहस्य कथा’ को एक बेहतरीन Thriller के दायरे तक ही सीमित कर दिया है I तकनीक ही है जिसकी वजह से पाठक को पढ़ते हुवे घटनाओं की तारतम्यता और timeline को लेकर अतिरिक्त सजगता की आवश्यकता पड़ती है और कहीं कहीं पीछे जाकर पन्ने पलटना पड़ सकता है और पढ़ते पढ़ते उलझना भी पड़ सकता है I

उपन्यास का सबसे कमज़ोर पहलू उसकी Timeline का बिलकुल सटीक ना होना है I लेखक नें क्यूँ इसके लिए सरलीकरण का सहारा लिया वो समझ से परे है I महीनो के नाम के स्थान पर ऋतुओं का प्रयोग कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगा I और इसी सरलीकरण के चलते एक घटना विसंगति सी होने का आभास देती है – अध्याय ८ में जिसकी timeline २०१३ शरद से –वर्ष २०१४ शरद तक यानी पूरे एक वर्ष की दी है और वहां पर जिस घटना का जिक्र है उसके अंतर्गत एक डायलाग “ मैं तो बस गुरुप्रताप के ही करंट लगा पाया “ है I ये करंट लगाने वाली घटना अध्याय 4, वर्ष २०१४ – बसंत- में घटित होती दर्शाई गयी है I अध्याय ८ की घटना से ये तुरंत स्पष्ट नहीं होता की उस वक़्त जो घटना घटित होती दिखाई जा रही है वो २०१३ में हो रही है अथवा २०१४ में ? हालांकि इस घटना के बाद पिछले साल घटित हुई घटनाओं का संक्षिप्त सार सा है मगर औसत बुद्धि पाठक के लिए ये स्पष्ट होना मुश्किल ही है I बसंत २०१४ की घटना ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से मार्च से मई के दरमियान कभी भी घटित हुई हो सकती है और २०१३ शरद से २०१४ शरद की घटनाएँ सितम्बर से नवम्बर २०१३ से लेकर सितम्बर –नवम्बर २०१४ के मध्य कभी भी घटित हुई हो सकती हैं I तार्किक आधार पर बसंत २०१४ में हुई घटना इस समयसीमा के अंतर्गत आ गयी I मगर जिस तरह वहां पर दर्शाया गया है उसके आधार पर समझना मुश्किल हो जाता है एक बार में I बेहतर होता की ऋतुओं के स्थान पर हिंदी महीनो के नाम होते या अंग्रेजी में I ये इस उपन्यास का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष है I

Flashback और Cut to Back and Forth तकनीक का प्रयोग करने के स्थान पर लेखक नें अगर १९९८ की घटना को आरम्भ में बतौर पूर्वकथा के तौर पर प्रयोग करते हुवे Linear Sequence में मदन मिश्र का उपयोग करते हुवे कहानी को आगे बढ़ाया होता तो एक लाज़वाब Police Procedural सामने होता I उपयोग की गयी तकनीक के आधार पर एक सधा हुआ लेखन तो है उक्त उपन्यास में मगर कोई भी किरदार उभरकर सामने नहीं आया I उपन्यास समाप्त होने के बाद एक अलग ही अनुभूति और संतुष्टि का अनुभव होता है मगर पात्र विस्मृत हो जाते हैं और कथा ही स्मृति में कहीं जगह बना पाती है I उपन्यास समाप्त होकर एक भावुक मोड़ पर छोड़ जाता है जहाँ हर चीज़ सही ही प्रतीत होती है और आरम्भ में लिखी आल्हा की पंक्तियों को जस्टिफाई करती हैं I बेहतर होता की चरित्रों और पात्रों को थोडा और खुलकर सामने आने का अवसर मिलता I मदन मिश्र प्रभावित करते हैं मगर स्मृति का अंग बनकर रह जाएँ उतना भी नहीं I इन दोनों तकनीकों का बेहतरीन प्रयोग जिस प्रकार Sue Coletta के उपन्यासों में देखने को मिलता है उसकी छोटी सी झलक ‘ सिंह मर्डर केस ‘ में भी नजर आती है हालांकि इस उपन्यास का कैनवस Sue Coletta के उपन्यासों जैसा विस्तृत नहीं है I लेकिन एक हिंदी लेखक के लेखन में उक्त की एक झलक भी दिख जाना अपने आप में सुखद है I

कुल जमा “ सिंह मर्डर केस “ के लेखक के रूप में हिंदी अपराध लेखन को एक नया लेखक मिला है जिसकी कलम में दम है और खुद को पढ़वा ले जाने की काबिलियत भी I उन्होंने उमीदें जगाई हैं I आशा है निकट भविष्य में कुछ और भी बेहतर पढ़ने को मिले I फिलहाल एक पढ़ने योग्य किताब I मेरी तरफ से 4 स्टार रेटिंग I

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Singh murder caseSingh murder case by Ramakant Mishra
My rating: 4 of 5 stars

कोई भी काम खासतौर पर लेखन कर्म जब अपनी पूरी तैयारी और ईमानदार कोशिशों से परवान चढ़ता है तो उसका मकसद भी पूरी शिद्दत से कामयाब होता है I लिखना एक जटिल प्रक्रिया है और इस लिखने के दौरान एक गंभीर लेखक को न केवल अपने पात्रों की मनःस्थिति से जूझना पड़ता है बल्कि निरंतर खुद के भीतर उमड़ घुमड़ रहे अनगिनत विचारों की क्रमवार श्रृंखलाओं से भी दो चार होना पड़ता है I और इस होती निरंतर उथल पुथल का प्रभाव रचना पर पड़ना स्वाभाविक है I
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पुस्तक समीक्षा #1 : एक हसीन क़त्ल – लेखक -मोहन मौर्य

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Reviewed By :- SABA KHAN

अपनी अन्तःप्रेरणा के चलते जब कोई अपने भीतर गहरे में पक रहे किसी कथानक को एक छोटे अफ़साने या एक उपन्यास के रूप में लिखता है और सकुचाते हुवे उसे पाठकों के मध्य समर्पण भाव से  भेजता है यह जानने के लिए की उसका लेखन किस हद तक फलित हुआ है, किस हद तक वो लेखक अपने पाठकों को खुद से जोड़ पाने में कामयाब रहा है, ये सब बातें एक तरफा तौर पर पाठकों की पसंद नापसंद के पैमानों पर मुनहसर है I ये पैमाने भी परम्परागत खांचों में ही रचे बसे हो सकते हैं या फिर किसी हद तक लेखक के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण अपनाकर उसका उत्साहवर्धन करने वाले हो सकते हैं I किसी भी विधा में सर्वप्रथम लेखन क्षेत्र में अपना प्रयास करने वाले लेखक से किसी भी स्तर पर बहुत ज्यादा उम्मीदें बाँध लेना उस लेखक के साथ एक तरह की ज्यादती है और ये उम्मीद तो और भी ज्यादा बेमानी है जब उसी विधा के किसी स्थापित लेखक से उसकी तुलना करते हुवे उसके लेखन को परख की कसौटी पर परखा जाए I देशी विदेशी सभी प्रकार के साहित्य में ऐसे कई महान लेखक हुवे हैं जिन्होंने बहुत आगे जाकर अपनी वर्तमान उपलब्धियों का आंकलन करते हुवे जब अपने पूर्व लेखन का निरीक्षण किया है तो उसे खारिज किये जाने लायक तक आँक दिया है I आज लेखन में नित नए नए नवोदित लेखकों के आगमन से जहाँ एक ओर पाठकों के सामने ये सवाल खड़ा हो जाता है की क्या पढ़ें क्या न पढ़े, इसे पढ़ें या उसे पढ़ें वहां इस बात की जरूरत बड़ी शिद्दत से पैदा हो जाती है की अगर किसी पाठक को किसी नवोदित लेखक में ‘बतौर लेखक कोई भी तत्व’ पढ़ते समय नजर आता है तो पाठक को उस नवोदित लेखक को प्रोत्साहित करना चाहिए और नवोदित होने के खाते में कुछ नापसंदगी जैसा भाव तिरोहित किया जा सकता है I यहाँ पर उस नवोदित लेखक को भी आत्ममुग्धता जैसी स्थिति से बचते हुवे संभलकर आगे बढ़ना वाजिब है I

तकरीबन एक महीने पहले अमीर सिंह जी ने एक अपील करती हुई पोस्ट डाली थी मोहन मौर्य के उपन्यास ‘एक हसीन क़त्ल’ को पाठकों द्वारा पढ़े जाने की I ये एक सराहनीय प्रयास था एक नवोदित को उन जैसे साहित्यिक अभिरुचियों वाले व्यक्ति द्वारा प्रोत्साहन के तौर पर I मैंने उसी दिन अमेज़न पर आर्डर कर दिया था और एक हफ्ते के भीतर मुझे मिल गया था I मैंने उसे पढ़कर खत्म भी उसी दिन कर दिया था लेकिन कुछ व्यक्तिगत और कुछ प्रोफेशनल मजबूरियों के तहत उस बाबत अपनी कैसी भी राय प्रेषित ना कर सकी थी, खैर देर आयद दुरुस्त आयद I

उपन्यास हाथ में आते ही ‘कवर आर्ट’ ने अरुचि सी पैदा की क्योंकि कवर आर्ट कहीं से भी आकर्षक न लगा लेकिन भीतर पन्नों पर नजर डालते ही जो चीज़ सबसे पहले निगाह के दायरे में आई वो इस किताब की पेपर क्वालिटी – जो कि बहुत उम्दा है I १६० के करीब सफ्हें हैं और कीमत १९९ रुपये (हालांकि मुझे अमेज़न से मंगाने पर १५० के आसपास पड़ी थी ) –ये कीमत बहुत ज्यादा है, मगर तकनीकी तौर पर देखा जाए तो प्रकाशित हुई प्रतियों का भी इस कीमत पर फर्क पड़ना लाजिमी है I अन्दर के पृष्ठों पर हुई छपाई देखकर हैरत हुई की टाइपिस्ट ने एलाइनमेंट को जस्टीफाई किया ही नहीं है और पूरे text को जस का तस word format से प्रिंट में ले लिया गया है I किताब पढ़ते हुवे निरंतर ‘प्रूफ’ की गलतियों से दो चार होना पड़ा और निकट भविष्य में प्रकाशन संस्था ‘सूरज पॉकेट बुक्स’ को इस दिशा में सार्थक और भरसक प्रयास करने होंगे I

उपन्यास की कहानी शुरू होती है राजनगर पब्लिक स्कूल से जहाँ लंचटाइम में रिया नाम की एक लड़की सहपाठियों से राज नाम के लड़के के बारे में पूछती है और जब उसे ज्ञात होता है की राज को किसी सीमा नाम की लड़की के साथ देखा गया था तो उसे ये जानकर गहरा धक्का पहुंचता है I रिया एक 17 वर्षीय निहायत ही खूबसूरत लड़की है जिसमे खूबसूरत होना अगर गुण है तो इस गुण के अलावा उसके निहायत ही जिद्दी होने और गुस्सैल होने के अवगुण भी हैं I रिया शहर के पुलिस कमिश्नर एम्० के० शर्मा की दुलारी बेटी है जो राज पर दिलोजान से फ़िदा है I दूसरी ओर सीमा है जो एक 17 वर्षीय रिया जितनी ही खूबसूरत लड़की है मगर मिज़ाज में ऐन रिया के उलट है और हर बात को निहायत ही संजीदगी और समझदारी से लेती है और उसका यही मिज़ाज राज को अपनी ओर खींच लेता है I सीमा के पिता मधुसूदन गुप्ता राष्ट्रीय राजनीति का एक पुराना घाघ चेहरा हैं और केंद्र में मंत्री हैं जो 2G घोटाले में फंसा हुआ है I त्रिकोण का तीसरा कोण राज है जो एक १८ वर्षीय खूबसूरत लड़का है और जिसे रिया मन ही मन में प्यार करती है मगर कभी इज़हार नहीं कर पायी है I राज का एक बड़ा भाई है धीरज जो एक पुलिस इंस्पेक्टर है और राज पर जान लुटाता है और राज उस पर I कुछ छोटी छोटी घटनाओं, प्रसंगों, प्रेमियों की चुहलबाजियों, कॉलेज की मौज मस्ती के सहारे कहानी आगे बढ़ती है और फिर एक दिन एक क़त्ल हो जाता है और उसी क़त्ल को लेकर हुई उठा पटक, तफ्तीश और कातिल के बेनकाब होने के साथ साथ प्रेम में समर्पण, त्याग, बाप का बेटी के प्रति , बेटी का बाप के प्रति , भाई का भाई के प्रति अगाध प्रेम जैसी मानवीय भावनाओं से ओत प्रोत कथानक से युक्त उपन्यास है ‘एक हसीन क़त्ल’ I

उपन्यास लिखते समय मोहन मौर्य कुछ दुविधा में फंसे से नजर आये हैं विशेषकर narrative form को लेकर I क्यूंकि शुरुवात उन्होंने अध्याय की जगह दृश्य १,  दृश्य २ करके की है जो कुछ समझ में नहीं आया की उसका मंतव्य क्या है ? कोई Play का Scene लिखा गया है या film का ? पहले अध्याय में स्थान –राजनगर पब्लिक स्कूल, समय -११.०५, लंच टाइम से अफ़साने को आगाज़ दिया गया है और पहले अध्याय को दृश्य १ लिखने को सार्थक किया है की किसी स्थान विशेष पर विशेष समय पर उक्त घटना घटित हो रही है I लेकिन बाद के सभी दृश्यों में ये form गायब है और कहानी आम उपन्यासों जैसे ही चलती है I तो बेहतर यही रहता की दृश्य के स्थान पर पहला अध्याय, दूसरा अध्याय करके ही लिखा जाता I पूरा उपन्यास कुल २३ अध्यायों (दृश्यों) में लिखा गया है I

कुल जमा १६० सफ़हों पर बिखरी इस दास्तान में क़त्ल के विषय में ८० वें पृष्ठ (दृश्य १५) पर बताया गया है जो एक रहस्य कथा के अनुसार बिलकुल ही सही नहीं है I ये बात इस आधार पर कही जा रही है जबकि इस उपन्यास का जोर शोर से प्रचार प्रसार बतौर murder mystery किया गया था और किताब के टाइटल कवर पर लिखी हुईं पंक्तियाँ “एक स्कूल गर्ल के मर्डर की उलझी हुई दास्तान जिसे सुलझाने के लिए पूरी पुलिस फ़ोर्स को दांतों तले पसीना आ गया और जब राज खुला तो …” साबित भी करती है I

पहले ७९ पृष्ठों तक ९० के दशक की बॉलीवुड मूवीज में दर्शाए गए कॉलेज जीवन की झांकियां वही स्टूडेंट्स की चुहलबाजियां और कोरी भावुकता से भरे दृश्यों की भरमार है और पढ़ते हुवे दिमाग के अन्दर आयशा जुल्का, अक्षय कुमार, मोहनीश बहल, सईद जाफरी, जैसे कलाकारों की तस्वीरें भी आती जाती हैं I ८० पृष्ठ के बाद कहानी रफ़्तार पकडती है और अंत तक बाँध कर रखती है लेकिन क़त्ल की तफ्तीश और तहकीकात के angle कहीं से उभर कर सामने नहीं आते हैं ( जबकि किरदार के तौर पर इंस्पेक्टर का भी दखल है कहानी को बढ़ाने में और ये किरदार महज तफ्तीश के लिए नियुक्त जासूस जैसा किरदार न होकर कहानी का ही एक अहम् अंग है ) I कातिल की शिनाख्त Rules of Inference के आधार पर विस्तृत रूप में न किये जाकर काम चलाऊ deduction के आधार पर ही करना अच्छा आईडिया नहीं है वो भी तब जब लेखक खुद को बतौर एक रहस्य कथा लेखक स्थापित करने के लिए प्रयासरत हो I

बात जब रहस्य कथा की हो तो कम से कम एक ऐसी कोजी mystery तो जरूर अपेक्षित होती है जिसमे कोई गुत्थी हो, सुराग हो और परत दर परत रहस्य पर से पर्दा उठे I लेकिन यहाँ पर लेखक ने चतुराई का परिचय देते हुवे इस ‘murder mystery’ के प्लाट को एक hardcore murder mystery के दाएरे से बाहर ले जा कर  sub genre ‘Romantic Suspense Thriller’ के खांचे में फिट करके सारी खताएं बख्शवा ली हैं I क्यूंकि mystery उपन्यास में जब Romance Peripheral हो जैसा की Carola Dunn, Dorothy L. Sayers की किताबों में है तो रहस्य कथा के बहाव् में उसका कोई फर्क नहीं पड़ता है I लेकिन जब Mystery Secondry  हो और romance प्रमुख हो तो रहस्य कथा रहस्य कथा जैसा रोमांच पैदा ही नहीं कर सकती है I और दोनों का समावेश करके कोई hardcore mystery लिखना किसी विरले लेखक का ही काम होगा I ‘एक हसीन क़त्ल’ में एक कामयाब Romantic Suspense Thriller के लिए जरूरी सभी तत्व मौजूद हैं और Suspense का स्तर ऊंचा रखा गया है जो इसकी गुणवत्ता में इजाफा करता है I

लेखक ने सबसे ज्यादा प्रभावित अपनी भाषा और शैली में किया है I लेखक के पास एक सशक्त भाषा और शैली है I  आम बोलचाल की भाषा, अंग्रेजी के बड़े बड़े शब्दों, वाक्यों और लच्छेदार मुहावरों के प्रयोग से परहेज़ रखा है और बहुत आसान और सहज भाषा में अपने उपन्यास को पढ़वा ले जाते हैं I

उपन्यास को पढ़वा ले जाना किसी लेखक के लिए बड़ी सफलता है और मोहन मौर्य इस मामले में पूरी तरह कामयाब हैं I

कुल मिलाकर ‘एक हसीन क़त्ल’ को नवोदित लेखक का प्रथम प्रयास जानकर, बगैर किसी स्थापित लेखक से तुलना किये बगैर, बगैर किसी पूर्वाग्रह के पढ़े जाने की जरूरत है I और hardcore Mystery Lover को भी Change के तौर पर ही सही इस उपन्यास को जरूर पढ़ना चाहिए अगर एक प्यारी सी हलकी फुलकी कहानी पढ़ने का मन है और दिमागी मशक्कत का लोभ भी तब तो मोहन मौर्य ने ये उपन्यास इसी मकसद से लिखा है I और बतौर लेखक उन्होंने उम्मीद जगाई है I आशा है की बहुत जल्द और भी बेहतर कुछ लेकर आयेंगे वो I लेखक के रूप में किया गया उनका ये प्रयास सराहनीय है I मेरी तरफ से इस उपन्यास को 3.5 स्टार रेटिंग I

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